Name | Image | Stages | Periods | Symptoms |
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गेहूँ | ![]() |
Tillering stages | जनबरी से मार्च तक यह रोग पाया जाता है | | इस रोग के लक्षण प्रारम्भ में पत्तियों के उपरी सतह पर पीले रंग की धारियों के रूप में देखने को मिलते हैं जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती पर फैल जाती हैं। इसलिए इसे धारीदार रतुआ भी कहते हैं और पत्तियों को छूने पर यह हल्दी जैसा पाउडर हाथों पर लग जाता है। इस रोग से संक्रमित खेतों में प्रवेश करने पर यह पीले रंग का पाउडर कपड़ों पर भी लग जाता है। |
गेहूं | ![]() |
Vegetative stages | फरबरी से मार्च तक यह रोग पाया जाता है | पोस्ट्यूल गोलाकार या थोड़ा अण्डाकार होते हैं, जो स्टेम रस्ट की तुलना में छोटे होते हैं, आमतौर पर, आपस में नहीं जुड़ते हैं, और नारंगी से लेकर नारंगी-भूरे रंग के यूरेडियोस्पोर्स तक होते हैं।संक्रमण स्थल मुख्य रूप से पत्तियों और पत्ती के आवरण की ऊपरी सतहों पर और कभी-कभी गर्दन और आंवों पर पाए जाते हैं |
गेहूं | ![]() |
Reproductive stage | फरवरी से मार्च तक यह रोग पाया जाता है | पोस्ट्यूल गोलाकार या थोड़ा अण्डाकार होते हैं, जो स्टेम रस्ट की तुलना में छोटे होते हैं, आमतौर पर, आपस में नहीं जुड़ते हैं, और नारंगी से लेकर नारंगी-भूरे रंग के यूरेडियोस्पोर्स तक होते हैं।संक्रमण स्थल मुख्य रूप से पत्तियों और पत्ती के आवरण की ऊपरी सतहों पर और कभी-कभी गर्दन और आंवों पर पाए जाते हैं |
मूंग | ![]() |
Reproductive stage | यह रोग जुलाई से सितम्बर मे पाया जाता है | पतियों के ऊपर हल्के छोटे छोटे पीले रंग के दब्बे दिखाई देते है इसके प्रभाब मे पती सुकड़ और मुड जाती है |
मूंग | ![]() |
Vegetative stages | यह रोग जुलाई से सितम्बर मे पाया जाता है | इस रोग का प्रकोप पौधों के सभी वायवीय भागों पर हो सकता है | इसमें सर्वप्रथम पत्तियों की निचली सतह पर छोटे – छोटे सफेद बिंदु देते हैं जो बाद में बड़ा सफेद धब्बा बना लेता हैं | रोग की तीव्रता के साथ सफेद धब्बों का आकार भी बढ़ता जाता है | |
मूंगफली | ![]() |
Reproductive stage | यह रोग जुलाई से सितम्बर मे पाया जाता है | इस रोग का प्रकोप पौधों के सभी वायवीय भागों पर हो सकता है | इसमें सर्वप्रथम पत्तियों की निचली सतह पर छोटे – छोटे सफेद बिंदु देते हैं जो बाद में बड़ा सफेद धब्बा बना लेता हैं | रोग की तीव्रता के साथ सफेद धब्बों का आकार भी बढ़ता जाता है | |
पीला रतुआ रोग गेहूं के सबसे खतरनाक और विनाशकारक रोगों में से एक है। इसे धारीदार रतुआ भी कहते हैं जो पक्सीनिया स्ट्राईफारमिस नामक कवक से होता है। पीला रतुआ फसल की उपज में शत प्रतिशत नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। इस बीमारी से उत्तर भारत में गेहूं की फसल का उत्पादन और गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित होती है।
इस रोग के लक्षण प्रारम्भ में पत्तियों के उपरी सतह पर पीले रंग की धारियों के रूप में देखने को मिलते हैं जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती पर फैल जाती हैं। इसलिए इसे धारीदार रतुआ भी कहते हैं और पत्तियों को छूने पर यह हल्दी जैसा पाउडर हाथों पर लग जाता है। इस रोग से संक्रमित खेतों में प्रवेश करने पर यह पीले रंग का पाउडर कपड़ों पर भी लग जाता है।
गेरुई रोग से बचाव के लिए किसान प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी, मैंकोजेब 75 प्रतिशत, जिनेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी, जिरम 80 प्रतिशत, थायोफनेट मिथाइल 70 प्रतिशत में घोल तैयार कर छिड़काव कर सकते हैं।