मूंगफली


Short Description:
मूंगफली की खेती तिलहनी फसल के रूप में की जाती है | इसका पौधा उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला होता है | जिससे इसकी खेती खरीफ और जायद के समय की जाती है | भारत में मूंगफली को आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक और गुजरात राज्यों में अधिक मात्रा में उगाया जाता है | इसके अलावा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान ऐसे राज्य है, जहां पर मूंगफली की खेती विशेष रूप से की जाती है |

Climate:
यदि आप अपने खेत में मूंगफली की फसल उगाना चाहते हैं तो इसके लिए यह जानना जरूरी है कि आपकी जमीन की जलवायु मूंगफली की फसल के अनुकूल है या नहीं? बता दें कि मूंगफली भारत की महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। वहीं अच्छी पैदावार के लिए कम से कम 30 डिग्री सेल्सियस तापमान होना आवश्यक है। यूं तो इसकी खेती वर्ष भर की जा सकती है लेकिन खरीफ सीजन की बात की जाए तो जून माह के दूसरे पखवाड़े तक इसकी बुवाई की जानी चाहिए।

Soil Type:
अच्छे जल निकास और रेतली दोमट वाली ज़मीन में मूंगफली बीजी जाती है। अच्छे जल निकास वाली मिट्टी, जिसकी पी एच 6.5-7 और उपजाऊ ज़मीनों में इसकी फसल बहुत अच्छी होती है। भारी जमीनें मूंगफली के लिए अनुकूल नहीं हैं क्योंकि भारी ज़मीनों में फलियां कम भरती हैं।
Soil Treatment:
इसके उपयोग के लिए 8 -10 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद लेते हैं तथा इसमें 2 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडी और 2 किलो ब्यूवेरिया बेसियाना को मिला देते हैं एवं मिश्रण में नमी बनाये रखते हैं. यह क्रिया में सीधी धूप नहीं लगनी चाहिए. अतः इसे छाव या पेड़ के नीचे करते हैं. नियमित हल्का पानी देकर नमी बनाये रखना होता है

Seed Treatment:
मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए गिरियों को 3 ग्राम थीरम या 3 ग्राम कप्तान या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रति किलो गिरियों का उपचार कर लें । रासायनिक उपचार करने के बाद बीज को 4 ग्राम टराईकोडरमा विराइड या स्यूडोमोनास फ्लूरोसैंस 10 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार कर लें । बीज उपचार जड़ गलन और तना बीमारियों से नए पौधों की सुरक्षा होती है।
Seed Rate:
28-30 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। Amber and Chitra के लिए प्रति एकड़ मे 26-28 किलो बीजों की आवश्यकता होती है। जबकि Kaushal, TG 37 A, Prakash की बिजाई के लिए 35-40 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग किए जाते हैं।

Time of Sowing:
बिजाई का समय मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए मूंगफली की बिजाई जुलाई महीने के दूसरे पखवाड़े में करें।
Method of Sowing:
बीज की गहराई सीड ड्रिल की सहायता से 5 सैं.मी. की गहराई में फलियों को बोयें। बिजाई का ढंग बीज को सीड ड्रिल की सहायता से बोया जाता है। मूंगफली की बिजाई के लिए इसकी बिजाई वाली मशीन भी उपलब्ध होती है।

Fertilizers :
मिट्टी की जांच के आधार पर खादों की मात्रा डालें। मूंगफली की पूरी फसल को नाइट्रोजन 8 किलो (यूरिया 18 किलो), फासफोरस 12 किलो (एस एस पी 75 किलो) और पोटाश 18 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 30 किलो) प्रति एकड़ में डालें और जिप्सम 100 किलो और बोरेक्स 1.6 किलो प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन, जिप्सम की आधी मात्रा और फासफोरस, पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। मिट्टी में 2-3 सैं.मी. की गहराई में खादें डालें। नाइट्रेाजन, जिप्सम की बाकी बची मात्रा और बोरेक्स की पूरी मात्रा बिजाई के 3 सप्ताह बाद डालें। सिंचित क्षेत्रों में, बिजाई से एक या दो सप्ताह पहले जिप्सम 100 किलो प्रति एकड़ में डालें और फिर सिंचाई करें। जिप्सम से फलियों के बनने और अच्छी तरह भरने में मदद करती है।
Water Requirements :
फसल की अच्छी वृद्धि के लिए मौसमी वर्षा के आधार पर दो या तीन बार सिंचाई करनी आवश्यक है। फूल बनने, फली के विकास का समय सिंचाई के लिए नाज़ुक समय होता है। इन अवस्थाओं के समय पानी की कमी ना होने दें।
Harvest Time:
खरीफ की ऋतु में बोयी फसल नवंबर महीने में पक जाती है, जब पौधे एक जैसे पीले हो जाते है और पुराने पत्ते झड़ने शुरू हो जाते है| अंत-अप्रैल से अंत-मई में बोई गयी फसल मानसून के बाद अंत-अगस्त और सितंबर में पक जाती है| सही पुटाई के लिए मिट्टी में नमी होनी चाहिए और फसल को ज्यादा पकने ना दें| जल्दी पुटाई के लिए पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी की तरफ से तैयार किये गए मूंगफली की पुटाई करने वाले यंत्र का प्रयोग करें| पुटाई की हुई फसल के छोटे-छोटे ढेरों को कुछ दिन के लिए धुप में पड़े रहने दें| इसके बाद 2-3 दिनों के लिए फसल को एक जगह पर इकट्ठा करके रोज़ाना 2-3 बार तरंगली से झाड़ते रहे, ताकि फलियों और पत्तों को पौधे से अलग किया जा सके| फलियों और पत्तों को इकट्ठा करके देर लगा दें| स्टोर करने से पहले फलियों को 4-5 दिनों के लिए धुप में सूखा लें| बादलवाई वाले दिनों में फलियों को अलग करके ऐयर ड्राइयर में 27-38° सै. तापमान पर दो दिन के लिए या फलियों के गुच्छे को (6-8%) सूखने तक रहने दें|

Weeds:

Weeds Symptoms:

Weeds Management:
अच्छी वृद्धि और अच्छी उपज के लिए पहले 45 दिनों के दौरान नदीनों की रोकथाम करनी जरूरी होती है। यदि नदीनों का नियंत्रण उचित तरीके से ना किया जाये तो उपज में लगभग 34 -60 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। दो गोडाई करें, पहली बिजाई के तीन सप्ताह बाद और दूसरी पहली गोडाई के तीन सप्ताह बाद करें। फलियां बनने के बाद गोडाई ना करें। बीज बोने से पहले फ्लूक्लोरालिन 600 मि.ली. की प्रति एकड़ में स्प्रे करें। इससे घास और चौड़े पत्तों की रोकथाम में मदद मिलेगी। नदीनों की अच्छी रोकथाम के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर की स्प्रे नदीनों के अंकुरण होने से पहले प्रति एकड़ में करें। यह एक जरूरी प्रक्रिया है, जो कि बीजने के 40-45 दिनों के बाद की जाती है। इसकी मदद से पौधे आसानी से मिट्टी में चले जाते हैं जिससे फलियों के विकास में वृद्धि होती है।
Diseases:
1- टीका और पत्तों के ऊपर धब्बा रोग : 2- बीज गलन या जड़ गलन : 3- झुलस रोग :

Diseases Symptoms:
1- टीका और पत्तों के ऊपर धब्बा रोग : इसके कारण पत्तों के ऊपरी हिस्से पर गोल धब्बे पड़ जाते हैं, और आस पास हल्के पीले रंग के गोल धब्बे होते हैं। 2- बीज गलन या जड़ गलन : यह फल के निचली जड़ों वाले भाग पर हमला करती है| इससे पौधे सूख कर नष्ट हो जाते है| 3- झुलस रोग : इससे पौधे के पत्तों पर हल्के से गहरे भूरे रंग धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में प्रभावित पत्ते अंदर की तरफ मुड़ जाते है और भुरभुरे हो जाते है| ए. आलटरनेटा द्वारा पैदा हुए धब्बे, गोल और पानी वाले होते है, जो पत्ते की पूरी सतह पर फैल जाते है|

Diseases Management:
1- टीका और पत्तों के ऊपर धब्बा रोग : सिंचित फसलों पर कार्बेनडाज़िम (बाविस्टिन, डीरोसोल, एग्रोज़िम) 50 डब्लयू पी 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 2- बीज गलन या जड़ गलन : इसका हमला दिखाई दें तो मैनकोजेब 3 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम और कार्बेन्डाज़िम 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर ड्रेंच करे | 3- झुलस रोग : सिंचित फसलों पर कार्बेनडाज़िम (बाविस्टिन, डीरोसोल, एग्रोज़िम) 50 डब्लयू पी 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
Insects / Pests:
1- दीमक : 2- फली छेदक : 3- बालों वाली सुंडी : 3- चेपा :

Insects / Pests Symptoms:
1- दीमक : यह कीट फसल की जड़ों और तने में जा कर पौधों को नष्ट करता है| यह फलियों और बीजों में सुराख़ करके नुकसान पहुंचाता है। इसके हमले से पौधा सूखना शुरू हो जाता है। 2- फली छेदक : यह छोटे पौधों में सुराख़ बना देते हैं और अपना मल छोड़ते है| इसके छोटे कीट शुरू में सफेद रंग के होते हैं और फिर भूरे रंग की के हो जाते हैं। 3- बालों वाली सुंडी : यह कीट ज्यादा गिनती में हमला करते हैं, जिससे पत्ते झड़ जाते हैं। इसका लार्वा लाल-भूरे रंग का होता है, जिसके शरीर पर काले रंग की धारियां और लाल रंग के बाल होते है| 3- चेपा : यह काले रंग के छोटे कीड़े पौधों का रस चूसते है, जिस कारण पौधों का विकास रुक जाता हैं और पौधा पीला दिखाई देता है| यह पौधे पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ते हैं, जो बाद में फंगस लगने के कारण काला हो जाता है।

Insects / Pests Management:
1- दीमक : इसके बचाव के लिए बिजाई से पहले 6.5 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस से प्रति किलो बीज का उपचार करें | बिजाई से पहले विशेष खतरे वाले इलाकों में 1 लीटर क्लोरपाइरीफॉस का छिड़काव प्रति एकड़ में करें| 2- फली छेदक : क्लोरपाइरीफॉस 2 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से स्प्रे करे | 3- बालों वाली सुंडी : बड़ी सुंडियों की रोकथाम के लिए 200 मि.ली. डाइक्लोरवॉस 100 ई सी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 3- चेपा : इसकी रोकथाम के लिए रोगोर 300 मि.ली. या इमीडाक्लोप्रिड 17.8% एस एल 100 मि.ली. को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
Nutrients:

Nutrients Deficiency Symptoms:

Nutrients Deficiency Management: