काला रतुआ


Alternate / Local Name:
काला रतुआ,ब्लैक रस्ट ,स्टेम रस्ट

Short Description:
काला रतुआ रोग को ब्लैक रस्ट या तने का रतुआ रोग भी कहते हैं। इस रोग का रोग जनक पक्सीनिया ग्रैमिनिस ट्रिटिसाई नामक कवक है। यह रोग प्रारम्भ में निलगिरी तथा पलनी पहाडिय़ों से आता है तथा इसका प्रकोप दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों में अधिक होता है। उत्तरी क्षेत्र में यह रोग फसल पकने के समय पहुंचता है।
AFFECTED CROPS

Name Image Stages Periods Symptoms
गेहू Vegetative stages जनबरी से मार्च तक यह रोग पाया जाता है इस बीमारी से बने धब्बों में काले-भूरे रंग के विषाणु होते हैं। जो आमतौर पर पत्तों पर बारीक धारियां बनाते हैं।

काला रतुआ रोग को ब्लैक रस्ट या तने का रतुआ रोग भी कहते हैं। शुरुआत में इस रोग के होने पर पौधों के तने एवं पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। रोग बढ़ने के साथ धब्बों का रंग काला होने लगता है। 20 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक तापमान होने पर यह रोग तेजी से फैलता है।

इस रोग का संक्रमण होने पर गहरे रक्ताभ भूरे रंग के फफोले मुख्यतः तने पर उत्पन्न होते हैं. उसके बाद पर्णच्छद व पत्तियों पर भी बन जाते हैं. यह फफोले आपस में मिलकर तने व पत्तियों पर बड़े क्षेत्रों को घेर लेते हैं जिसके परिणामस्वरूप तने कमजोर हो सकते हैं और भारी हवाओं और बारिश में पौधे गिर भी सकते हैं. अगर संक्रमण गंभीर हो जाता है, तो दाने कमजोर व झुर्रीदार बनते जिससे उपज बहुत कम हो जाती है.

रोग के लक्षण दिखाई देते ही प्रोपीकोनाजोल 25 ई.सी. (टिल्ट) या टेब्यूकोनाजोल 25 ई.सी. का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें. रोग के प्रकोप तथा फैलाव को देखते हुए दूसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतर पर करें.