टमाटर


Short Description:
टमाटर की फसल को साल के किसी में भी मौसम में किया जा सकता है| टमाटर का सेवन मानव शरीर के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है क्योकि टमाटर के अंदर कई तरह के पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस और विटामिन सी जैसे तत्व उपस्थित होते है|

Climate:
वर्षा- 400-600 मिमी बुवाई का तापमान- 10-15 डिग्री सेल्सियस कटाई का तापमान- 15-25 डिग्री सेल्सियस

Soil Type:
इस फसल की खेती अलग-अलग मिट्टी की किस्मों में की जा सकती है, जैसे कि रेतली, चिकनी, दोमट, काली, लाल मिट्टी, जिसमें पानी के निकास का सही प्रबंध हो। इसकी अच्छी पैदावार के लिए इसे अच्छे निकास वाली रेतली मिट्टी में उत्तम जैविक तत्वों से उगाया जा सकता है। अच्छे निकास वाली मिट्टी की पी एच 7-8.5 होनी चाहिए। यह तेजाबी और खारी मिट्टी में भी उगने योग्य फसल है। ज्यादा तेजाबी मिट्टी में खेती ना करें। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी लाभदायक है, जबकि अच्छी पैदावार के लिए चिकनी, दोमट और बारीक रेत वाली मिट्टी बहुत अच्छी है।
Soil Treatment:
इसके उपयोग के लिए 8 -10 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद लेते हैं तथा इसमें 2 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडी और 2 किलो ब्यूवेरिया बेसियाना को मिला देते हैं एवं मिश्रण में नमी बनाये रखते हैं. यह क्रिया में सीधी धूप नहीं लगनी चाहिए. अतः इसे छाव या पेड़ के नीचे करते हैं. नियमित हल्का पानी देकर नमी बनाये रखना होता है

Seed Treatment:
क्यारियों में पौधों को लगाने से पहले क्यारियों को ठीक से पानी देकर उन्हें गीला कर दिया जाता है, ताकि पौधों के ख़राब होने की सम्भावना को कम किया जा सके | खेत में पौधों को लगाने से पहले उन्हें कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल से 20 से 25 मिनट तक उपचारित कर लेना चाहिए |
Seed Rate:
टमाटर के बीजो को सीधा खेत में न उगा कर पहले इन्हे नर्सरी (पौध घर) में तैयार किया जाता है | यदि पौधे साधारण किस्म के है तो उनके लिए प्रति हेक्टयेर 400 से 500 ग्राम बीजो की जरूरत होती है और यदि संकर किस्म के पौधे है तो उनमे 250 से 300 ग्राम तक बीज ही काफी होते है

Time of Sowing:
बसंत के मौसम के लिए नर्सरी नवंबर-दिसंबर में तैयार करें जबकि सर्दियों के मौसम में सितंबर-अक्तूबर महीने में नर्सरी में बीजों को बोयें।
Method of Sowing:
यदि आप टमाटर की अच्छी फसल प्राप्त करना चाहते है, तो कभी भी उसे समतल भूमि में नहीं उगाना चाहिए बल्कि उसे डेढ़ फ़ीट की दूरी पर मेड को तैयार कर उसमे पौधे लगाने चाहिए, तथा दो पौधों के बीच में लगभग एक फिट की दूरी होनी चाहिए पौधों की रोपाई के लिए शाम का समय अच्छा माना जाता है इस वक़्त रोपाई करने से पौधों के ख़राब होने की सम्भावना कम होती है पौधों को लगाने के पश्चात ही उसमे पानी भी लगा देना चाहिए

Fertilizers :
माटर की खेती में पोषक तत्वों की अधिक जरूरत होती है, इसलिए यदि आप टमाटर की अच्छी पैदावार चाहते है तो खेत में खाद (Fertilizer) की सही मात्रा को सही समय पर जरूर दें | इसके लिए खेती से पहले जुताई के वक़्त प्रति हेक्टयेर खेत में 20 से 25 गाड़ी गोबर की खाद को दो से तीन हफ्ते पहले खेत में डाल कर मिट्टी में ठीक से मिला दें |गोबर की खाद के अलावा रासायनिक खाद भी टमाटर की खेती के लिए बहुत जरूरी होती है | खेत की अंतिम जुताई के वक़्त 80 किलोग्राम नाइट्रोजन , 50 किलोग्राम पोटाश और फास्फोरस 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए फिर 5 हफ्ते के बाद 20 किलोग्राम नाइट्रोजन की मात्रा पौधों की सिंचाई के वक़्त दें | फिर एक महीने के पश्चात एक बार फिर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन से खेत की सिंचाई करे |
Water Requirements :
रोपाई के बाद दो से तीन दिन हल्की सिंचाई करें। मिट्टी में नमी के आधार पर सर्दियों में 12 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें और गर्मियों में 6-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। फूल निकलने की अवस्था सिंचाई के लिए गंभीर होती हैं। इस अवस्था में पानी की कमी से फूलों का गिरना बढ़ता है और फलों और उत्पादकता पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है। बहुत सारी जांचों के मुताबिक यह पता चला है कि हर पखवाड़े में आधा इंच सिंचाई करने से जड़ें ज्यादा फैलती हैं और इससे पैदावार भी अधिक हो जाती है। अत्याधिक सिंचाई ना करें।
Harvest Time:
टमाटर की फसल पौधों को लगाने के 90 दिन के पश्चात तोड़ने के लिए तैयार हो जाते है | फलों को तोड़ते वक़्त ज्यादा लाल फलों को अलग और कठोर फलों को अलग रखा जाता है,

Weeds:

Weeds Symptoms:

Weeds Management:
खरपतवार सभी फसल के लिए हानिकारक होते है, पर अगर बात करे टमाटर के फसल की तब खरपतवार पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी हो जाता है क्योकि यह खरपतवार टमाटर की फसल को अधिक हानि पहुंचाते है | ऐसा इसलिए होता है, क्योकि टमाटर की जड़े ज्यादा गहरी नहीं होती है तथा सभी पौधे मिट्टी की ऊपरी सतह से पोषक तत्व लेते है| ऐसे में यदि पौधों के पास खरपतवार रहती है तो पौधे पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व ग्रहण नहीं कर पाते है तथा उनका विकास रुक जाता है, और पैदावार भी घट जाती है | इसलिए टमाटर की खेती को खरपतवार से अधिक बचाकर रखना पड़ता है| फसल में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए खेतो में समय – समय पर निराई – गुड़ाई होती रहनी चाहिए| जिससे पौधों की जड़ो को पर्याप्त मात्रा में वायु और पोषक तत्व प्राप्त होते रहे और पौधों का विकास ठीक तरह से होता रहे |
Diseases:
1- ऐंथ्राक्नोस: 2- झुलस रोग : 3- मुरझाना और पत्तों का झड़ना : 4- पत्तों पर धब्बे :

Diseases Symptoms:
1- ऐंथ्राक्नोस: गर्म तापमान और ज्यादा नमी वाली स्थिति में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। इस बीमारी से पौधे के प्रभावित हिस्सों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं। यह धब्बे आमतौर पर गोलाकार, पानी के साथ भीगे हुए और काली धारियों वाले होते हैं। 2- झुलस रोग : यह टमाटर की खेती में आम पाई जाने वाली प्रमुख बीमारी है। शुरू में पत्तों पर छोटे भूरे धब्बे होते हैं। बाद में ये धब्बे तने और फल के ऊपर भी दिखाई देते हैं। पूरी तरह विकसित धब्बे भद्दे और गहरे भूरे हो जाते हैं जिनके बीच में गोल सुराख होते हैं। 3- मुरझाना और पत्तों का झड़ना : यह बीमारी नमी वाली या बुरे निकास वाली मिट्टी में होती है। यह मिट्टी में पैदा होने वाली बीमारी है। इससे तना पानी में डुबोने से मुरझाया हुआ दिखता है और मुरझाना शुरू हो जाता है। इससे पौधे निकलने से पहले ही मर जाते हैं। 4- पत्तों पर धब्बे : यह बीमारी पौधे को भोजन के रूप में प्रयोग करती है। जिससे पौधा कमज़ोर हो जाता है। यह आमतौर पर पुराने पत्तों पर फल बनने में थोड़ा समय पहले या फल बनने के समय हमला करती है।

Diseases Management:
1- ऐंथ्राक्नोस: इसे रोकने के लिए मैनकोज़ेब 400 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 300 ग्राम या क्लोरोथैलोनिल 250 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा करें। 2- झुलस रोग : यदि इसका हमला देखा जाये तो मैनकोज़ेब 400 ग्राम या टैबूकोनाज़ोल 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर की स्प्रे करें। पहली स्प्रे से 10-15 दिनों के बाद दोबारा स्प्रे करें। 3- मुरझाना और पत्तों का झड़ना : जड़ों के गलने से रोकने के लिए 1 प्रतिशत यूरिया 100 ग्राम प्रति 10 लीटर और कॉपर आक्सी क्लोराइड 250 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी को मिट्टी में मिलाएं। 4- पत्तों पर धब्बे : बीमारी को रोकने के लिए हैकसा कोनाज़ोल के साथ स्टिकर 1 मि.ली.प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।
Insects / Pests:
1- पत्ते का सुरंगी कीड़ा : 2- सफेद मक्खी : 3- थ्रिप्स : 4- फल छेदक :

Insects / Pests Symptoms:
1- पत्ते का सुरंगी कीड़ा : यह कीट पत्तों को खाते हैं और पत्ते में टेढी मेढी सुरंगे बना देते हैं। यह फल बनने और प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर भी असर करता है। 2- सफेद मक्खी : यह पत्तों में से रस चूसकर पौधों को कमज़ोर बनाती है। यह शहद की बूंद की तरह के पत्तों पर काले धब्बे छोड़ती है। यह पत्ता मरोड़ बीमारी का भी कारण बनते हैं। 3- थ्रिप्स : यह पत्तों का रस चूसता है, जिस कारण पत्ते मुड़ जाते हैं। पत्तों का आकार कप की तरह हो जाता है और यह ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं। इससे फूल झड़ने भी शुरू हो जाते हैं। 4- फल छेदक : यह पत्ते, फूल और फल खाता है। यह फलों पर गोल छेद बनाता है और इसके गुद्दे को खाता है।

Insects / Pests Management:
1- पत्ते का सुरंगी कीड़ा : इस कीड़े पर नियंत्रण करने के लिए डाईमैथोएट 30 ई सी 250 मि.ली.या स्पीनोसैड 80 मि.ली.में 200 लीटर पानी या ट्राइज़ोफोस 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। 2- सफेद मक्खी : ज्यादा हमला होने पर एसिटामिप्रिड 20 एस पी 80 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी पानी की स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा 3- थ्रिप्स : यदि थ्रिप की मात्रा ज्यादा हो तो इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 100 मि.ली या फिप्रोनिल 300 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 4- फल छेदक : फल छेदक को रोकने के लिए कोराज़न 60 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें।
Nutrients:
नाइट्रोजन

Nutrients Deficiency Symptoms:

Nutrients Deficiency Management:
एक महीने के पश्चात एक बार फिर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन से खेत की सिंचाई करे |