आलू


Short Description:
आलू विश्व की एक महत्तवपूर्ण सब्जियों वाली फसल है। यह एक सस्ती और आर्थिक फसल है, जिस कारण इसे गरीब आदमी का मित्र कहा जाता है। यह फसल दक्षिणी अमरीका की है और इस में कार्बोहाइड्रेट और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

Climate:
बुवाई का तापमान-15-25°C कटाई तापमान-14-20°C वर्षा-300-500mm

Soil Type:
आलू की खेती के लिए समतल और मध्यम ऊंचाई वाले खेत ज्यादा उपयुक्त होते हैं। साथ ही अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी और बलुई दोमट मिट्टी जिसकी पीएच मान 5.5 से 5.7 के बीच हो।
Soil Treatment:
इसके उपयोग के लिए 8 -10 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद लेते हैं तथा इसमें 2 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडी और 2 किलो ब्यूवेरिया बेसियाना को मिला देते हैं एवं मिश्रण में नमी बनाये रखते हैं. यह क्रिया में सीधी धूप नहीं लगनी चाहिए. अतः इसे छाव या पेड़ के नीचे करते हैं. नियमित हल्का पानी देकर नमी बनाये रखना होता है |

Seed Treatment:
बीज उपचार करने से उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि हो जाती है। बीज उपचार के लिए आलू के कंद को एक ग्राम कॉर्बनडाजिन या मैनकोजिब या कॉर्बोक्सिन दो ग्राम प्रति लीटर की पानी में घोल बना कर बीज को उपचारित करें। इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखें कि उपचारित बीज को 24 घंटे के अंदर बुआई कर दें।
Seed Rate:
बिजाई के लिए छोटे आकार के आलू 8-10 क्विंटल, दरमियाने आकार के 10-12 क्विंटल और बड़े आकार के 12-18 क्विंटल प्रति एकड़ के लिए प्रयोग करें।

Time of Sowing:
अगेती बुवाई : 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तका समय से बुवाई : (मुख्य फसल) 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक।
Method of Sowing:
बिजाई के ट्रैक्टर से चलने वाली या ऑटोमैटिक बिजाई के लिए मशीन का प्रयोग करें।

Fertilizers :
बिजाई से दो सप्ताह पहले खेत की तैयारी के समय 200 क्विंटल प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डालें। फसल की उचित वृद्धि के लिए नाइट्रोजन 75 किलो (165 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (155 किलो सिंगल सुपर फासफेट) और पोटाश 25 किलो (40 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश) की मात्रा प्रति एकड़ में डालें। बिजाई के समय नाइट्रोजन का 3/4 हिस्सा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा डालें। बाकी बचा हुआ नाइट्रोजन का 1/4 हिस्सा बिजाई से 30-40 दिन बाद जड़ों से मिट्टी लगाने के समय डालें। हल्की ज़मीनों में आधी मात्रा नाइट्रोजन और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें और बाकी की नाइट्रोजन दो हिस्सों में जड़ों को मिट्टी लगाने के समय दो बार करके डालें। मोटे आलुओं की पैदावार के लिए 13:0:45 की 2 किलो और मैगनीश्यिम ई डी टी ए 100 ग्राम प्रति एकड़ की स्प्रे करें। बीमारियों के हमले को रोकने के लिए फंगसनाशी प्रॉपीनेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी डालें। आलुओं का आकार और गिणती बढ़ाने के लिए हयूमिक एसिड (12 प्रतिशत) 3 ग्राम + एम ए पी 12:61:0 की 8 ग्राम या डी ए पी 15 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे पौधे की वृद्धि के समय करें।
Water Requirements :
सिंचाई : पहली सिंचाई बुवाई के 15-18 दिन बाद करना चाहिए, इस बात का ध्यान रहे कि मेड़ आधे से अधिक नहीं डूबे। उसके बाद 10-15 दिन के अन्तर पर 8-10 सिंचाईयां करना आवश्यक है।
Harvest Time:
पत्तों के पीले होने और ज़मीन पर गिरने से फसल की पुटाई की जा सकती है। फसल को डंठलों की कटाई के 15-20 दिन बाद ज़मीन की नमी सही होने से उखाड़ लें। पुटाई ट्रैक्टर और आलू उखाड़ने वाली मशीन से या कही से की जा सकती है। पुटाई के बाद आलुओं को सुखाने के लिए ज़मीन पर बिछा दें और 10-15 दिनों तक रखें ताकि उनपर छिल्का आ सके। खराब और सड़े हुए आलुओं को बाहर निकाल दें। कटाई के बाद सब से पहले आलुओं को छांट लें और खराब आलुओं को हटा दें। आलुओं को व्यास और आकार के अनुसार बांटे। बड़े आलू चिपस बनने के कारण अधिक मांग में रहते हैं। आलुओं को 4-7 डिगरी सैल्सियस तापमान और सही नमी पर भंडारण करें।

Weeds:

Weeds Symptoms:

Weeds Management:
आलू के पौधे जब 12-15 से.मी. लम्बे हो जाये तो एक हल्की सिंचाई करके ओट आने पर खुरपी से खरपतवार निकाल दें और साथ ही कुदाल से मिट्टी को भुरभुरा करके यूरिया की दी जाने वाली मात्रा को देकर मिट्टी चढ़ा दें। यूरिया डालते समय इस बात का ध्यान रहे कि ओस न रहे अन्यथा यूरिया से पत्ते जलने का डर रहता है। 1-फुरुसातो - ऑक्सीफ्लोरफेन 23.5% ईसी @ 170-340 मिलीलीटर 200-300 लीटर पानी में घोलकर / एकड़ का पूर्व-उद्भव अनुप्रयोग करे। 2-तनोशी - मैट्रीबुजीन 70 %WP @ 300 ग्राम प्रति 280-400 लीटर पानी में घोलकर आलू की बुवाई के 3 से 4 दिन बाद या आलू पौधों की 5 सं लंबी पर छिड़काव करे I
Diseases:
1-अगेता झुलस रोग 2-पिछेता झुलस रोग 3-आलुओं पर काले धब्बे 4-आलुओं पर काली परत 5-चितकबरा रोग

Diseases Symptoms:
1-अगेता झुलस रोग -इससे नीचे के पत्तों पर धब्बे पड़ जाते हैं। यह बीमारी मिट्टी में स्थित फंगस के कारण आती है। कम तापमान और अधिक नमी होने के समय यह बीमारी तेजी से फैलती है। 2-पिछेता झुलस रोग - इस बीमारी का हमला पत्तों के शिखरों और नीचे के भाग पर देखा जा सकता है। प्रभावित पत्तों पर बेढंगे आकार के धब्बे दिखते हैं और धब्बों के आस पास सफेद पाउडर बन जाता है। ज्यादा हमले की सूरत में प्रभावित पौधों की नज़दीक की मिट्टी में सफेद पाउडर दिखाई देता है। यह बीमारी बारिश के बाद और बादलवाई वाले मौसम में अधिक फैलती है। 3-आलुओं पर काले धब्बे - इस बीमारी से आलुओं पर काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं और पौधे सूखते दिखाई देते हैं। प्रभावित आलुओं के अंकुरन के समय आंखों पर काला और भूरा रंग आ जाता है। 4-आलुओं पर काली परत - यह बीमारी खेत और भंडारन दोनों में आती है। कम नमी वाली स्थिति में यह बीमारी तेजी से फैलती है। प्रभावित आलुओं पर हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। 5-चितकबरा रोग- इससे पत्ते पीले हो जाते हैं और पौधे का विकास रूक जाता है। आलुओं का आकार और गिणती कम हो जाती है।

Diseases Management:
1-अगेता झुलस रोग - खेत में एक ही फसल बार बार ना लगाएं। बदल बदल कर फसलें उगाएं। यदि हमला दिखे तो मैनकोजेब 30 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 30 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 45 दिनों के बाद 10 दिनों के फासले पर 2-3 बार स्प्रे करें। 2-पिछेता झुलस रोग - बिजाई के लिए सेहतमंद और बीमारी मुक्त बीज प्रयोग करें। यदि हमला दिखे तो प्रॉपीनेब 40 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी की स्प्रे करें। 3-आलुओं पर काले धब्बे - बिजाई के लिए बीमारी मुक्त बीज प्रयोग करें। बिजाई से पहले आलुओं को मरकरी के घोल से उपचार करें। एक फसल को बार बार ना उगाएं। यदि खेत को दो वर्षों के लिए खाली छोड़ दिया जाये तो बीमारी के खतरे को कम किया जा सकता है। 4-आलुओं पर काली परत - खेत में सिर्फ अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद का ही प्रयोग करें। बीमारी रहित बीजों का प्रयोग करें। बीजों को ज्यादा गहराई में ना बोयें। एक ही फसल बार बार ना उगाएं। बिजाई से पहले बीजों को एमीसन 6 के 0.25 प्रतिशत (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) घोल से 5 मिनट के लिए उपचार करें। 5-चितकबरा रोग- बिजाई के लिए सेहतमंद और बीमारी रहित बीज का प्रयोग करें। खेत की लगातार जांच करें और प्रभावित पौधों और हिस्सों को तुरंत नष्ट कर दें। इसकी रोकथाम के लिए मैटासिसटोक्स या रोगोर 300 मि.ली. को प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
Insects / Pests:
1 -चेपा 2 - कुतरा सुंडी 3 - पत्ते खाने वाली सुंडी 4 - लाल भुंडी 5- सफेद सुंडी

Insects / Pests Symptoms:
1 -चेपा - यह कीट पौधों का रस चूसते हैं और पौधे को कमज़ोर बनाते हैं। गंभीर हमले से पौधे के पत्ते मुड़ जाते हैं और पत्तों का आकार बदल जाता है। प्रभावित हिस्सों पर काले रंग की फंगस लग जाती है। 2 - कुतरा सुंडी - यह सुंडी पौधे को अंकुरन के समय काटकर नुकसान पहुंचाती हैं। यह रात के समय हमला करती है, इसलिए इसे रोकना मुश्किल है। इसके नुकसान को कम करने के लिए रूड़ी की खाद का प्रयोग करें। 3 - पत्ते खाने वाली सुंडी - यह सुंडी पत्ते खाकर फसल का नुकसान करती है। 4 - लाल भुंडी - यह सुंडी और कीड़ा पत्ते खाकर फसल का नुकसान करती है। 5- सफेद सुंडी - यह कीड़ा मिट्टी में रहता है और जड़ों, तनों और आलुओं को खाता है। इससे प्रभावित पौधे सूखे हुए दिखाई देते हैं और आलुओं में सुराख हो जाते हैं।

Insects / Pests Management:
1 -चेपा -चेपे के हमले को चैक करने के लिए अपने इलाके के समय अनुसार पत्तों को काट दें। यदि चेपे या तेले का हमला दिखे तो इमीडाक्लोप्रिड 50 मि.ली. या थायामैथोक्सम 40 ग्राम प्रति एकड़ 150 लीटर पानी की स्प्रे करें। 2 - कुतरा सुंडी - दि इसका हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस 20 प्रतिशत ई सी 2.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। पौधों पर फोरेट 10 जी 4 किलो प्रति एकड़ डालें और मिट्टी से ढक दें। यदि तंबाकू सुंडी का हमला दिखे तो रोकथाम के लिए क्विनलफॉस 25 ई सी 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे करें। 3 - पत्ते खाने वाली सुंडी - यदि खेत में इसका हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस या प्रोफैनाफॉस 2 मि.ली. या लैंबडा साइहैलोथ्रिन 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। 4 - लाल भुंडी - इनके हमले के शुरूआती समय में इनके अंडे इक्ट्ठे करके खेत से दूर नष्ट कर दें। इसकी रोकथाम के लिए कार्बरिल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। 5- सफेद सुंडी - इसे रोकने के लिए बिजाई के समय कार्बोफिउरॉन 3 जी 12 किलो या थिमट 10 जी 7 किलो प्रति एकड़ डालें।
Nutrients:

Nutrients Deficiency Symptoms:

Nutrients Deficiency Management: